Maithili Sharan Gupt Birth Anniversary: Remembering the Rashtrakavi Through 3 of His Immortal Poems
Rashtra Kavi (national poet) Maithili Sharan Gupt | (Photo Credits: Wikimedia Commons)

Mumbai, August 3: Today is the 132nd birth anniversary of Rashtra Kavi (national poet) Maithili Sharan Gupt. The poet, writer and freedom fighter, who was born in Chirgaon in Uttar Pradesh's Jhansi district, was praised by Mahatma Gandhi for his inspiring and patriotic poems. Considered to be one of the biggest writers in Hindi literature, the poet has to his name some of the most important works of 20th century Hindi literature.

Maithili Sharan Gupt, is also regarded as one of the pioneers of Khari boli (a dialect in Hindi). Gupt used the Khari boli at a time when mostly Hindi poets wrote in the Braj Bhasha dialect. He was also awarded the Padma Bhusan (third highest civilian award) for his contribution to the field of literature and public life.

Sharing some of his most inspirational and important patriotic poems below:

1. Jeevan ki Jai Ho (Long Live Life)

मृषा मृत्यु का भय है

जीवन की ही जय है ।

जीव की जड़ जमा रहा है

नित नव वैभव कमा रहा है

यह आत्मा अक्षय है

जीवन की ही जय है।

नया जन्म ही जग पाता है

मरण मूढ़-सा रह जाता है

एक बीज सौ उपजाता है

सृष्टा बड़ा सदय है

जीवन की ही जय है।

जीवन पर सौ बार मरूँ मैं

क्या इस धन को गाड़ धरूँ मैं

यदि न उचित उपयोग करूँ मैं

तो फिर महाप्रलय है

जीवन की ही जय है।

2. Bharatvarsh (India or Bharat)

मस्तक ऊँचा हुआ मही का, धन्य हिमालय का उत्कर्ष।

हरि का क्रीड़ा-क्षेत्र हमारा, भूमि-भाग्य-सा भारतवर्ष॥

हरा-भरा यह देश बना कर विधि ने रवि का मुकुट दिया,

पाकर प्रथम प्रकाश जगत ने इसका ही अनुसरण किया।

प्रभु ने स्वयं 'पुण्य-भू' कह कर यहाँ पूर्ण अवतार लिया,

देवों ने रज सिर पर रक्खी, दैत्यों का हिल गया हिया!

लेखा श्रेष्ट इसे शिष्टों ने, दुष्टों ने देखा दुर्द्धर्ष!

हरि का क्रीड़ा-क्षेत्र हमारा, भूमि-भाग्य-सा भारतवर्ष॥

अंकित-सी आदर्श मूर्ति है सरयू के तट में अब भी,

गूँज रही है मोहन मुरली ब्रज-वंशीवट में अब भी।

लिखा बुद्धृ-निर्वाण-मन्त्र जयपाणि-केतुपट में अब भी,

महावीर की दया प्रकट है माता के घट में अब भी।

मिली स्वर्ण लंका मिट्टी में, यदि हमको आ गया अमर्ष।

हरि का क्रीड़ा-क्षेत्र हमारा, भूमि-भाग्य-सा भारतवर्ष॥

आर्य, अमृत सन्तान, सत्य का रखते हैं हम पक्ष यहाँ,

दोनों लोक बनाने वाले कहलाते है, दक्ष यहाँ।

शान्ति पूर्ण शुचि तपोवनों में हुए तत्व प्रत्यक्ष यहाँ,

लक्ष बन्धनों में भी अपना रहा मुक्ति ही लक्ष यहाँ।

जीवन और मरण का जग ने देखा यहीं सफल संघर्ष।

हरि का क्रीड़ा-क्षेत्र हमारा, भूमि-भाग्य-सा भारतवर्ष॥

मलय पवन सेवन करके हम नन्दनवन बिसराते हैं,

हव्य भोग के लिए यहाँ पर अमर लोग भी आते हैं!

मरते समय हमें गंगाजल देना, याद दिलाते हैं,

वहाँ मिले न मिले फिर ऐसा अमृत जहाँ हम जाते हैं!

कर्म हेतु इस धर्म भूमि पर लें फिर फिर हम जन्म सहर्ष

हरि का क्रीड़ा-क्षेत्र हमारा, भूमि-भाग्य-सा भारतवर्ष॥

3. Nar Ho, Naa Nirash Karo Mann Ko (O Human, Do Not Feel Disappointed)

नर हो, न निराश करो मन को

कुछ काम करो, कुछ काम करो

जग में रह कर कुछ नाम करो

यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो

समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो

कुछ तो उपयुक्त करो तन को

नर हो, न निराश करो मन को।

संभलो कि सुयोग न जाय चला

कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला

समझो जग को न निरा सपना

पथ आप प्रशस्त करो अपना

अखिलेश्वर है अवलंबन को

नर हो, न निराश करो मन को।

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ

फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ

तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो

उठके अमरत्व विधान करो

दवरूप रहो भव कानन को

नर हो न निराश करो मन को।

निज गौरव का नित ज्ञान रहे

हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे

मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे

सब जाय अभी पर मान रहे

कुछ हो न तज़ो निज साधन को

नर हो, न निराश करो मन को।

प्रभु ने तुमको कर दान किए

सब वांछित वस्तु विधान किए

तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो

फिर है यह किसका दोष कहो

समझो न अलभ्य किसी धन को

नर हो, न निराश करो मन को।

किस गौरव के तुम योग्य नहीं

कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं

जान हो तुम भी जगदीश्वर के

सब है जिसके अपने घर के

फिर दुर्लभ क्या उसके जन को

नर हो, न निराश करो मन को।

करके विधि वाद न खेद करो

निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो

बनता बस उद्‌यम ही विधि है

मिलती जिससे सुख की निधि है

समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को

नर हो, न निराश करो मन को

कुछ काम करो, कुछ काम करो।

Maithili Sharan Gupta was given the title of Rahstrakavi, for his book Bharat-Bharati. His book and verses were widely read and inspired India's freedom struggle. The title of Rahstrakavi was given to him by Mahatma Gandhi. His other notable works are Jaydrath Vadh, Panchvati, Yasodhara, Dwapar, and Shakti.